हर्यक वंश
हर्यक वंश
बिम्बिसार ने हर्यक वंश की स्थापना ५४४ ई.
पू. में की। इसके साथ ही राजनीतिक शक्ति के
रूप में बिहार का सर्वप्रथम उदय हुआ।
बिम्बिसार को मगध साम्राज्य का वास्तविक
संस्थापक/राजा माना जाता है। बिम्बिसार ने
गिरिव्रज (राजगीर)
को अपनी राजधानी बनायी। इसके वैवाहिक
सम्बन्धों (कौशल, वैशाली एवं पंजाब)
की नीति अपनाकर अपने साम्राज्य का विस्तार
किया।
बिम्बिसार (५४४ ई. पू. से ४९२ ई. पू.)-
बिम्बिसार एक कूटनीतिज्ञ और
दूरदर्शी शासक था। उसने प्रमुख राजवंशों में
वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर राज्य
को फैलाया।
सबसे पहले उसने लिच्छवि गणराज्य के शासक
चेतक की पुत्री चेलना के साथ विवाह किया।
दूसरा प्रमुख वैवाहिक सम्बन्ध कौशल
राजा प्रसेनजीत की बहन महाकौशला के साथ
विवाह किया। इसके बाद भद्र देश
की राजकुमारी क्षेमा के साथ विवाह किया।
महावग्ग के अनुसार बिम्बिसार की ५००
रानियाँ थीं। उसने अवंति के
शक्तिशाली राजा चन्द्र प्रद्योत के साथ
दोस्ताना सम्बन्ध बनाया। सिन्ध के शासक
रूद्रायन तथा गांधार के मुक्कु रगति से
भी उसका दोस्ताना सम्बन्ध था। उसने अंग
राज्य को जीतकर अपने साम्राज्य में
मिला लिया था वहाँ अपने पुत्र अजातशत्रु
को उपराजा नियुक्त किया था।
बिम्बिसार महात्मा बुद्ध का मित्र और संरक्षक
था। विनयपिटक के अनुसार बुद्ध से मिलने के
बाद उसने बौद्ध धर्म को ग्रहण किया, लेकिन
जैन और ब्राह्मण धर्म के
प्रति उसकी सहिष्णुता थी। बिम्बिसार ने करीब
५२ वर्षों तक शासन किया। बौद्ध और जैन
ग्रन्थानुसार उसके पुत्र अजातशत्रु ने उसे
बन्दी बनाकर कारागार में डाल
दिया था जहाँ उसका ४९२ ई. पू. में निधन
हो गया।
बिम्बिसार ने अपने बड़े पुत्र “दर्शक"
को उत्तराधिकारी घोषित किया था।
भारतीय इतिहास में बिम्बिसार प्रथम
शासक था जिसने स्थायी सेना रखी।
बिम्बिसार ने राजवैद्य जीवक को भगवान
बुद्ध की सेवा में नियुक्त किया था।
बौद्ध भिक्षुओं को निःशुल्क जल
यात्रा की अनुमति दी थी।s
बिम्बिसार की हत्या महात्मा बुद्ध के
विरोधी देवव्रत के उकसाने पर अजातशत्रु
ने की थी।
आम्रपाली- यह वैशाली की नर्तकी एवं परम
रूपवती काम कला प्रवीण वेश्या थी।
आम्रपाली के सौन्दर्य पर मोहित होकर
बिम्बिसार ने लिच्छवि से जीतकर राजगृह में ले
आया। उसके संयोग से जीवक नामक पुत्ररत्न
हुआ। बिम्बिसार ने जीवक को तक्षशिला में
शिक्षा हेतु भेजा। यही जीवक एक प्रख्यात
चिकित्सक एवं राजवैद्य बना। अजातशत्रु
(४९२-४६० ई. पू.)- बिम्बिसार के बाद
अजातशत्रु मगध के सिंहासन पर बैठा। इसके
बचपन का नाम कुणिक था। वह अपने
पिता की हत्या कर गद्दी पर बैठा। अजातशत्रु
ने अपने पिता के साम्राज्य विस्तार
की नीति को चरमोत्कर्ष तक पहुँचाया।
अजातशत्रु के सिंहासन मिलने के बाद वह अनेक
राज्य संघर्ष एवं कठिनाइयों से घिर गया लेकिन
अपने बाहुबल और बुद्धिमानी से सभी पर विजय
प्राप्त की। महत्वाकांक्षी अजातशत्रु ने अपने
पिता को कारागार में डालकर कठोर यातनाएँ
दीं जिससे पिता की मृत्यु हो गई। इससे दुखित
होकर कौशल रानी की मृत्यु हो गई।
कौशल संघर्ष- बिम्बिसार की पत्नी (कौशल)
की मृत्यु से प्रसेनजीत बहुत क्रोधित हुआ और
अजातशत्रु के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया।
पराजित प्रसेनजीत श्रावस्ती भाग गया लेकिन
दूसरे युद्ध-संघर्ष में अजातशत्रु पराजित
हो गया लेकिन प्रसेनजीत ने
अपनी पुत्री वाजिरा का विवाह कर
काशी को दहेज में दे दिया।
वज्जि संघ संघर्ष-
लिच्छवि राजकुमारी चेलना बिम्बिसार
की पत्नी थी जिससे उत्पन्न दो पुत्री हल्ल और
बेहल्ल को उसने अपना हाथी और रत्नों का एक
हार दिया था जिसे अजातशत्रु ने मनमुटाव के
कारण वापस माँगा। इसे चेलना ने अस्वीकार
कर दिया, फलतः अजातशत्रु ने लिच्छवियों के
खिलाफ युद्ध घोषित कर दिया।
वस्सकार से लिच्छवियों के बीच फूट डालकर
उसे पराजित कर दिया और लिच्छवि अपने
राज्य में मिला लिया।
मल्ल संघर्ष- अजातशत्रु ने मल्ल संघ पर
आक्रमण कर अपने अधिकार में कर लिया। इस
प्रकार पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक बड़े भू-भाग
मगध साम्राज्य का अंग बन गया।
अजातशत्रु ने अपने प्रबल
प्रतिद्वन्दी अवन्ति राज्य पर आक्रमण
करके विजय प्राप्त की।
अजातशत्रु धार्मिक उदार सम्राट था।
विभिन्न ग्रन्थों के अनुसार वे बौद्ध और
जैन दोनों मत के अनुयायी माने जाते हैं
लेकिन भरहुत स्तूप की एक वेदिका के ऊपर
अजातशत्रु बुद्ध की वंदना करता हुआ
दिखाया गया है।
उसने शासनकाल के आठवें वर्ष में बुद्ध के
महापरिनिर्वाण के बाद उनके अवशेषों पर
राजगृह में स्तूप का निर्माण करवाया और
४८३ ई. पू. राजगृह की सप्तपर्णि गुफा में
प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन किया।
इस संगीति में बौद्ध भिक्षुओं के
सम्बन्धित पिटकों को सुतपिटक और
विनयपिटक में विभाजित किया।
सिंहली अनुश्रुतियों के अनुसार उसने लगभग
३२ वर्षों तक शासन किया और ४६० ई.
पू. में अपने पुत्र उदयन
द्वारा मारा गया था।
अजातशत्रु के शासनकाल में
ही महात्मा बुद्ध ४८७ ई. पू.
महापरिनिर्वाण तथा महावीर का भी निधन
४६८ ई. पू. हुआ था।
उदयन- अजातशत्रु के बाद ४६० ई. पू. मगध
का राजा बना। बौद्ध ग्रन्थानुसार इसे
पितृहन्ता लेकिन जैन ग्रन्थानुसार पितृभक्त
कहा गया है। इसकी माता का नाम
पद्मावती था।
उदयन शासक बनने से पहले
चम्पा का उपराजा था। वह पिता की तरह
ही वीर और विस्तारवादी नीति का पालक
था।
इसने पाटलि पुत्र (गंगा और सोन के संगम)
को बसाया तथा अपनी राजधानी राजगृह से
पाटलिपुत्र स्थापित की।
मगध के प्रतिद्वन्दी राज्य अवन्ति के
गुप्तचर द्वारा उदयन की हत्या कर
दी गई।
बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार उदयन के तीन पुत्र
अनिरुद्ध, मंडक और नागदशक थे। उदयन के
तीनों पुत्रों ने राज्य किया। अन्तिम
राजा नागदासक था। जो अत्यन्त विलासी और
निर्बल था। शासनतन्त्र में शिथिलता के कारण
व्यापक असन्तोष जनता में फैला। राज्य
विद्रोह कर उनका सेनापति शिशुनाग राजा बना।
इस प्रकार हर्यक वंश का अन्त और शिशुनाग
वंश का अन्त और शिशुनाग वंश
की स्थापना ४१२ई.पू. हुई।
Sunday, 7 December 2014
History of Haryak-Vansh
Wednesday, 3 December 2014
History of indo-china war
भारत-चीन युद्ध
भारत - चीन युद्ध
शीत युद्ध का भाग
भारत - चीन के बीच हुआ युद्ध
तिथि 20 अक्टूबर r [1] – 21 नवम्
1962
स्था
न
दक्षिणी क्सिंजिंग (अक्साई ची
and अरुणाचल प्रदेश (दक्षि
तिब्बत, उत्तर पूर्व फ्रंटिय
एजेंसी )
परिण
ाम
चीनी सेना की जीत
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन
की छवि धूमिल
क्षेत्
रीय
बदल
ाव
अक्साई चिन चीन के नियंत्रण
आया
योद्धा
भारत चीन
सेनानायक
बृज मोहन
कौल
जवाहरलाल नेहरु
वी. के. कृष्ण
मेनन
प्राण नाथ थापर
जहाँग गुओ
माओ ज़ेडों
लिऊ बोचें
लिन बिओं
ज्होउ एन
शक्ति/क्षमता
10,000–12,000 80,000 [2][3]
मृत्यु एवं हानि
1,383 मृत्यु [4]
1,047 घायल [4]
1,696 लापता [4]
3,968 बंदी [4]
722 मृत्यु. [4
1,697 घायल [4]
भारत-चीन युद्ध जो भारत चीन
सीमा विवाद के रूप में भी जाना जाता है,
चीन और भारत के बीच 1962 में हुआ एक
युद्ध था। विवादित हिमालय सीमा युद्ध के
लिए एक मुख्य बहाना था, लेकिन अन्य
मुद्दों ने भी भूमिका निभाई। चीन में
1959 के तिब्बती विद्रोह के बाद जब
भारत ने दलाई लामा को शरण दी तो भारत
चीन सीमा पर हिंसक घटनाओं की एक
श्रृंखला शुरू हो गयी। भारत ने फॉरवर्ड
नीति के तहत मैकमोहन रेखा से
लगी सीमा पर अपनी सैनिक
चौकियाँ रखी जो 1959 में चीनी प्रीमियर
झोउ एनलाई के द्वारा घोषित वास्तविक
नियंत्रण रेखा के पूर्वी भाग के उत्तर में
थी।
चीनी सेना ने 20 अक्टूबर 1962 को
लद्दाख में और मैकमोहन रेखा के पार एक
साथ हमले शुरू किये।
चीनी सेना दोनों मोर्चे में भारतीय
बलों पर उन्नत साबित हुई और
पश्चिमी क्षेत्र में चुशूल में रेजांग-ला एवं
पूर्व में तवांग पर कब्ज़ा कर लिया। जब
चीन ने 20 नवम्बर 1962 को युद्ध
विराम और साथ ही विवादित क्षेत्र से
अपनी वापसी की घोषणा की तब युद्ध खत्म
हो गया।
भारत चीन युद्ध कठोर परिस्थितियों में
हुई लड़ाई के लिए उल्लेखनीय है। इस युद्ध
में ज्यादातर लड़ाई 4250 मीटर (14,000
फीट) से अधिक ऊंचाई पर लड़ी गयी। इस
प्रकार की परिस्थिति ने दोनों पक्षों के
लिए रसद और अन्य लोजिस्टिक समस्याएँ
प्रस्तुत की। भारत चीन युद्ध चीनी और
भारतीय दोनों पक्ष
द्वारा नौसेना या वायु सेना का उपयोग
नहीं करने के लिए भी विख्यात है।
स्थान
चीन और भारत के बीच एक लंबी सीमा है
जो नेपाल और भूटान के द्वारा तीन
अनुभागो में फैला हुआ है। यह
सीमा हिमालय पर्वतों से लगी हुई है
जो बर्मा एवं तत्कालीन
पश्चिमी पाकिस्तान (आधुनिक पाकिस्तान)
तक फैली है। इस सीमा पर कई विवादित
क्षेत्र अवस्थित हैं। पश्चिमी छोर में
अक्साई चिन क्षेत्र है जो स्विट्जरलैंड के
आकार का है। यह क्षेत्र चीनी स्वायत्त
क्षेत्र झिंजियांग और तिब्बत (जिसे चीन ने
1965 में एक स्वायत्त क्षेत्र घोषित
किया) के बीच स्थित है। पूर्वी सीमा पर
बर्मा और भूटान के बीच वर्तमान भारतीय
राज्य अरुणाचल प्रदेश (पुराना नाम- नॉर्थ
ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) स्थित है। 1962 के
संघर्ष में इन दोनों क्षेत्रों में चीनी सैनिक
आ गए थे।
ज्यादातर लड़ाई ऊंचाई वाली जगह पर हुई
थी। अक्साई चिन क्षेत्र समुद्र तल से
लगभग 5,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित
साल्ट फ्लैट का एक विशाल रेगिस्तान है और
अरुणाचल प्रदेश एक पहाड़ी क्षेत्र है
जिसकी कई चोटियाँ 7000 मीटर से अधिक
ऊँची है। सैन्य सिद्धांत के मुताबिक आम
तौर पर एक हमलावर को सफल होने के
लिए पैदल सैनिकों के 3:1 के अनुपात
की संख्यात्मक
श्रेष्ठता की आवश्यकता होती है।
पहाड़ी युद्ध में यह अनुपात
काफी ज्यादा होना चाहिए क्योंकि इलाके
की भौगोलिक रचना दुसरे पक्ष को बचाव
में मदद करती है। चीन इलाके का लाभ
उठाने में सक्षम था और
चीनी सेना का उच्चतम चोटी क्षेत्रों पर
कब्जा था। दोनों पक्षों को ऊंचाई और
ठंड की स्थिति से सैन्य और अन्य
लोजिस्टिक कार्यों में
कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और
दोनों के कई सैनिक जमा देने वाली ठण्ड से
मर गए।
परिणाम
चीन द्वारा अधिकृत भारतीय भूमि
चीन
चीन के सरकारी सैन्य इतिहास के अनुसार,
इस युद्ध से चीन ने अपने पश्चिमी सेक्टर
की सीमा की रक्षा की नीति के
लक्ष्यों को हासिल किया, क्योंकि चीन ने
अक्साई चिन का वास्तविक नियंत्रण बनाए
रखा। युद्ध के बाद भारत ने फॉरवर्ड
नीति को त्याग दिया और वास्तविक
नियंत्रण रेखा वास्तविक सीमाओं में
परिवर्तित हो गयी।
जेम्स केल्विन के अनुसार, भले ही चीन ने एक
सैन्य विजय पा ली परन्तु उसने
अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि के मामले में
खो दी। पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका,
को पहले से ही चीनी नजरिए, इरादों और
कार्यों पर शक था। इन देशों ने चीन के
लक्ष्यों को विश्व विजय के रूप में
देखा और स्पष्ट रूप से यह
माना की सीमा युद्ध में चीन हमलावर के रूप
में था। चीन की अक्टूबर 1964 में प्रथम
परमाणु हथियार परीक्षण करने और 1965
के भारत पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान
को समर्थन करने से कम्युनिस्टों के लक्ष्य
तथा उद्देश्यों एवं पूरे पाकिस्तान में
चीनी प्रभाव के अमेरिकी राय
की पुष्टि हो जाती है।
भारत
युद्ध के बाद भारतीय सेना में व्यापक
बदलाव आये और भविष्य में इसी तरह के
संघर्ष के लिए तैयार रहने की जरुरत महसूस
की गई। युद्ध से भारतीय
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर दबाव
आया जिन्हें भारत पर चीनी हमले
की आशंका में असफल रहने के लिए जिम्मेदार
के रूप में देखा गया। भारतीयों में
देशभक्ति की भारी लहर उठनी शुरू
हो गयी और युद्ध में शहीद हुए भारतीय
सैनिकों के लिए कई स्मारक बनाये गए।
यकीनन, मुख्य सबक जो भारत ने युद्ध से
सीखा है वह है अपने ही देश को मजबूत
बनाने की जरूरत और चीन के साथ नेहरू
की "भाईचारे" वाली विदेश नीति से एक
बदलाव की। भारत पर चीनी आक्रमण
की आशंका को भाँपने की अक्षमता के कारण,
प्रधानमंत्री नेहरू को चीन के साथ
शांतिवादी संबंधों को बढ़ावा के लिए
सरकारी अधिकारियों से कठोर
आलोचना का सामना करना पड़ा। भारतीय
राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने कहा कि नेहरू
की सरकार अपरिष्कृत और तैयारी के बारे में
लापरवाह थी। नेहरू ने स्वीकार
किया कि भारतीय अपनी समझ की दुनिया में
रह रहे थे। भारतीय नेताओं ने
आक्रमणकारियों को वापस खदेड़ने पर
पूरा ध्यान केंद्रित करने की बजाय
रक्षा मंत्रालय से कृष्ण मेनन को हटाने पर
काफी प्रयास बिताया। भारतीय सेना कृष्ण
मेनन के "कृपापात्र को अच्छी नियुक्ति"
की नीतियों की वजह से विभाजित
हो गयी थी और कुल मिलाकर 1962
का युद्ध भारतीयों द्वारा एक सैन्य पराजय
और एक राजनीतिक आपदा के संयोजन के रूप
में देखा गया। उपलब्ध विकल्पों पर गौर
न करके बल्कि अमेरिकी सलाह के तहत भारत
ने वायु सेना का उपयोग
चीनी सैनिको को वापस खदेड़ने में
नहीं किया। सीआईए (अमेरिकी गुप्तचर
संस्था) ने बाद में कहा कि उस समय तिब्बत
में न तो चीनी सैनिको के पास में पर्याप्त
मात्रा में ईंधन थे और न
ही काफी लम्बा रनवे था जिससे वे वायु
सेना प्रभावी रूप से उपयोग करने में
असमर्थ थे। अधिकाँश भारतीय चीन और
उसके सैनिको को संदेह की दृष्टि से देखने
लगे। कई भारतीय युद्ध को चीन के साथ
एक लंबे समय से शांति स्थापित करने में
भारत के प्रयास में एक विश्वासघात के रूप
में देखने लगे। नेहरू द्वारा "हिन्दी-
चीनी भाई, भाई" (जिसका अर्थ है "भारतीय
और चीनी भाई हैं") शब्द के उपयोग पर
भी सवाल शुरू हो गए। इस युद्ध ने नेहरू
की इन आशाओं को खत्म कर दिया कि भारत
और चीन एक मजबूत एशियाई ध्रुव
बना सकते हैं जो शीत युद्ध गुट
की महाशक्तियों के बढ़ते प्रभाव
की प्रतिक्रिया होगी।
सेना के पूर्ण रूप से तैयार नहीं होने
का सारा दोष रक्षा मंत्री मेनन पर आ गया,
जिन्होंने अपने सरकारी पद से इस्तीफा दे
दिया ताकि नए मंत्री भारत के सैन्य
आधुनिकीकरण को बढ़ावा दे सके।
स्वदेशी स्रोतों और आत्मनिर्भरता के
माध्यम से हथियारों की आपूर्ति की भारत
की नीति को इस युद्ध ने पुख्ता किया।
भारतीय सैन्य कमजोरी को महसूस करके
पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर में घुसपैठ
शुरू कर दी जिसकी परिणिति अंततः 1965
में भारत के साथ दूसरा युद्ध से हुआ।
हालांकि, भारत ने युद्ध में भारत की अपूर्ण
तैयारी के कारणों के लिए हेंडरसन-ब्रूक्स-
भगत रिपोर्ट का गठन किया था। परिणाम
अनिर्णायक था, क्योंकि जीत के फैसले पर
विभिन्न स्रोत विभाजित थे। कुछ
सूत्रों का तर्क है कि चूंकि भारत ने
पाकिस्तान से अधिक क्षेत्र पर कब्जा कर
लिया था, भारत स्पष्ट रूप से जीता था।
लेकिन, दूसरों का तर्क था कि भारत
को महत्वपूर्ण नुकसान उठाना पड़ा था और
इसलिए, युद्ध का परिणाम अनिर्णायक था।
दो साल बाद, 1967 में, चोल घटना के
रूप में चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच एक
छोटी सीमा झड़प हुई। इस घटना में आठ
चीनी सैनिकों और 4 भारतीय
सैनिकों की जान गयी।
हेंडरसन-ब्रूक्स-भगत रिपोर्ट
हार के कारणों को जानने के लिए भारत
सरकार ने युद्ध के तत्काल बाद ले. जनरल
हेंडरसन ब्रुक्स और इंडियन
मिलिट्री एकेडमी के तत्कालीन कमानडेंट
ब्रिगेडियर पी एस भगत के नेतृत्व में एक
समिति बनाई थी। दोनों सैन्य
अधिकारियो द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट
को भारत सरकार अभी भी इसे गुप्त
रिपोर्ट मानती है। दोनों अधिकारियों ने
अपनी रिपोर्ट में हार के लिए
प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू
को जिम्मेदार ठहराया था।
Tuesday, 2 December 2014
Bhopal tragedy
Bhopal disaster 1984: क्या है
भोपाल गैस कांड
02 दिसंबर, 1984 को घटित भोपाल गैस
त्रासदी भारत के इतिहास में वह काला अध्याय है
जिसे शायद ही कभी भुलाया जा सकेगा. भोपाल
स्थित यूनियन कार्बाइड प्लांट में 2 दिसंबर
को आधी रात में मिथाइल आइसोनेट (एमआईसी) के
रिसाव के कारण हजारों की तादाद में
लोगों की मृत्यु हो गई. सरकारी आंकड़ों के
मुताबिक इस दुर्घटना के कुछ ही घंटों के भीतर
तीन हज़ार लोग मारे गए थे. लेकिन
हमेशा की तरह यह सिर्फ सरकारी आंकड़ा था और
मरने वालों की संख्या और भी ज्यादा थी.
Bhopal disaster 1984 Effects:
भोपाल गैस कांड के पीड़ित
इस घटना को लेकर सुप्रीम कोर्ट को सौंपे गए
शपथ पत्र में मरने वालों की संख्या 5295 है
जबकि राज्य सरकार ने एक अन्य याचिका में मरने
वाले लोगों की संख्या 15248 बताई है. इस
तरह उक्त आंकड़ों को देखें तो विरोधाभास झलक
रहा है. यही नहीं इस हादसे में बीमार होने वाले
लोगों के आंकड़ों की संख्या में भी संशय के बादल
हैं. 2004 तक साढ़े तीन लाख से ज्यादा लोग
इस गैस रिसाव के कारण बीमारी की चपेट में आये
जिनका इलाज जारी है.
Justice in Bhopal disaster 1984:
भोपाल कांड का न्याय
दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी और 15
हजार से ज्यादा जानें छीनने वाली व पांच लाख से
ज्यादा लोगों को अपने घातक जद में लेने
वाली इस नरसंहारक घटना की मुआवजा राशि मात्र
713 करोड़ रुपये. भारत सरकार की अति रुचि और
यूनियन गैस कार्बाइड कारपोरेशन के
प्रति अतिरिक्त मोह ने गैस
पीड़ितों की संभावनाओं का गला घोंट दिया.
Monday, 1 December 2014
All indian president
नाम कार्यकाल
1.डॉ. राजेंद्र प्रसाद (1884 - 1963) जनवरी 26, 1950 - मई 13, 1962
2.डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1888 - 1975) मई 13, 1962 - मई 13, 1967
3.डॉ. जाकिर हुसैन (1897 - 1969) मई 13, 1967 - मई 03, 1969
4.वराहगिरि वेंकटगिरि (1884 - 1980)(कार्यवाहक) मई 03, 1969 - जुलाई 20, 1969
5.न्यायमूर्ति मोहम्मद हिदायतुल्लाह (1905 - 1992)
(कार्यवाहक)
जुलाई 20, 1969 - अगस्त 24,
1969
6.वराहगिरि वेंकटगिरि (1884 - 1980) अगस्त 24, 1969 - अगस्त 24,
1974
7.फखरुद्दीन अली अहमद (1905 - 1977) अगस्त 24, 1974 - फरवरी 11,
1977
8.बी.डी. जत्ती (1913 - 2002)(कार्यवाहक) फरवरी 11, 1977 - जुलाई 25,
1977
9.नीलम संजीव रेड्डी (1913 - 1996) जुलाई 25, 1977 - जुलाई 25,
1982
10.ज्ञानी जैल सिंह (1916 - 1994) जुलाई 25, 1982 - जुलाई 25,
1987
11.आर. वेंकटरमण (1910 - 2009) जुलाई 25, 1987 - जुलाई 25,
1992
12.डॉ. शंकर दयाल शर्मा (1918 - 1999) जुलाई 25, 1992 - जुलाई 25,
1997
13.के. आर. नारायणन (1920 - 2005) जुलाई 25, 1997 - जुलाई 25,
2002
14.डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (जन्म - 1931) जुलाई 25, 2002 - जुलाई 25,
2007
15.श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल (जन्म - 1934) जुलाई 25, 2007 - जुलाई 25,
2012
16.श्री प्रणब मुखर्जी (जन्म - 1935) जुलाई 25, 2012 से अब तक
Know indian Rashrapati
भारत के राष्ट्रपति
भारत के राष्ट्रपति संघ का कार्यपालक
अध्यक्ष हैं। संघ के सभी कार्यपालक कार्य
उनके नाम से किये जाते हैं। अनुच्छेद 53 के
अनुसार संघ की कार्यपालक शक्ति उनमें
निहित है। वह सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च
सेनानायक भी होता है। सभी प्रकार के
आपातकाल लगाने व हटाने वाला, युद्ध/
शांति की घोषणा करने वाला होता है। वह देश
का प्रथम नागरिक है। भारतीय
राष्ट्रपति का भारतीय नागरिक
होना आवश्यक है।
सिद्धांततः राष्ट्रपति के पास पर्याप्त
शक्ति होती है। पर कुछ अपवादों के
अलावा राष्ट्रपति के पद में निहित अधिकांश
अधिकार वास्तव में प्रधानमंत्री
की अध्यक्षता वाले मंत्रिपरिषद् के
द्वारा उपयोग किए जाते हैं।
भारत के राष्ट्रपति नई दिल्ली स्थित
राष्ट्रपति भवन में रहते हैं, जिसे
रायसीना हिल के नाम से भी जाना जाता है।
राष्ट्रपति अधिकतम दो कार्यकाल तक
ही पद पर रह सकते हैं। अब तक केवल पहले
राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद ने ही इस पद
पर दो कार्यकाल पूरा किया है।
प्रतिभा पाटिल भारत की 12वीं तथा इस पद
को सुशोभीत करने
वाली पहली महिला राष्ट्रपति हैं।[1] उन्होंने
25 जुलाई 2007 को पद व
गोपनीयता की शपथ ली थी।
सम्प्रति प्रणव मुखर्जी भारत के
राष्ट्रपति हैं।
इतिहास
15 अगस्त 1947 को भारत ब्रिटेन से
स्वतंत्र हुआ था और अन्तरिम व्यवस्था के
तहत देश एक राष्ट्रमंडल अधिराज्य बन
गया। इस व्यवस्था के तहत भारत के गवर्नर
जनरल को भारत के राष्ट्रप्रमुख के रूप में
स्थापित किया गया, जिन्हें भारत के
अन्तरिम राजा - जॉर्ज VI द्वारा ब्रिटिश
सरकार के बजाय भारत के
प्रधानमंत्री की सलाह पर नियुक्त
करना था।
यह एक अस्थायी उपाय था, परन्तु भारतीय
राजनीतिक प्रणाली में साझा राजा के
अस्तित्व को जारी रखना सही मायनों में
संप्रभु राष्ट्र के लिए उपयुक्त विचार
नहीं था। आजादी से पहले भारत के
आखरी ब्रिटिश वाइसराय लॉर्ड माउंटबेटन
हीं भारत के पहले गवर्नर जनरल बने थे।
जल्द ही उन्होंने सी.राजगोपालाचारी को यह
पद सौंप दिया, जो भारत के इकलौते भारतीय
मूल के गवर्नर जनरल बने थे। इसी बीच डॉ॰
राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में संविधान
सभा द्नारा 26 नवम्बर 1949 को भारतीय
सविंधान का मसौदा तैयार हो चुका था और
26 जनवरी 1950 को औपचारिक रूप से
संविधान को स्वीकार किया गया था। इस
तारीख का प्रतीकात्मक महत्व
था क्योंकि 26 जनवरी 1930 को भारतीय
राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटेन से पहली बार
पूर्ण स्वतंत्रता को आवाज़ दी थी। जब
संविधान लागू हुआ और राजेंद्र प्रसाद ने
भारत के पहले राष्ट्रपति का पद
सभांला तो उसी समय गवर्नर जनरल और
राजा का पद एक निर्वाचित राष्ट्रपति
द्वारा प्रतिस्थापित हो गया।
इस कदम से भारत की एक राष्ट्रमंडल
अधिराज्य की स्थिति समाप्त हो गया।
लेकिन यह गणतंत्र राष्ट्रों के राष्ट्रमंडल
का सदस्य बना रहा। क्योंकि भारत के
प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने तर्क
किया की यदि कोई भी राष्ट्र ब्रिटिश
सम्राट को "राष्ट्रमंडल के प्रधान" के रूप
में स्वीकार करे पर ज़रूरी नहीं है की वह
ब्रिटिश सम्राट को अपने राष्ट्रप्रधान
की मान्यता दे, उसे राष्ट्रमंडल में रहने
की अनुमति दी जानी चाहिए। यह एक
अत्यन्त महत्वपूर्ण निर्णय था जिसने
बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में नए-स्वतंत्र
गणराज्य बने कई अन्य पूर्व ब्रिटिश
उपनिवेशों के राष्ट्रमंडल में रहने के लिए एक
मिसाल स्थापित किया।
राष्ट्रपति का चुनाव
भारत के राष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक
प्रतिनिधित्व प्रणाली के एकल संक्रमणीय
मत पद्धति के द्वारा होता है।
राष्ट्रपति को भारत के संसद के
दोनो सदनों (लोक सभा और राज्य सभा )
तथा साथ ही राज्य विधायिकाओं (विधान
सभाओं) के निर्वाचित सदस्यों द्वारा पाँच
वर्ष की अवधि के लिए चुना जाता है। वोट
आवंटित करने के लिए एक फार्मूला इस्तेमाल
किया गया है ताकि हर राज्य
की जनसंख्या और उस राज्य से
विधानसभा के सदस्यों द्वारा वोट डालने
की संख्या के बीच एक अनुपात रहे और
राज्य विधानसभाओं के सदस्यों और
राष्ट्रीय सांसदों के बीच एक समानुपात
बनी रहे। अगर किसी उम्मीदवार को बहुमत
प्राप्त नहीं होती है तो एक स्थापित
प्रणाली है जिससे हारने वाले
उम्मीदवारों को प्रतियोगिता से
हटा दिया जाता है और उनको मिले वोट अन्य
उम्मीदवारों को तबतक हस्तांतरित होता है,
जबतक किसी एक को बहुमत नहीं मिलती।
राष्ट्रपति बनने के लिए आवश्यक
योग्यताएँ :
भारत का कोई नागरिक जिसकी उम्र 35
साल या अधिक हो वो एक राष्ट्रपति बनने
के लिए उम्मीदवार हो सकता है।
राष्ट्रपति के लिए उम्मीदवार को लोकसभा
का सदस्य बनने की योग्यता होना चाहिए
और सरकार के अधीन कोई लाभ का पद
धारण नहीं करना चाहिए। परन्तु निम्नलिखित
कुछ कार्यालय-धारकों को राष्ट्रपति के
उम्मीदवार के रूप में खड़ा होने
की अनुमति दी गई है:
वर्तमान राष्ट्रपति (अधिकतम
दो कार्यकाल)
वर्तमान उपराष्ट्रपति
किसी भी राज्य के राज्यपाल
संघ या किसी राज्य के मंत्री।
राष्ट्रपति के निर्वाचन
सम्बन्धी किसी भी विवाद में निणर्य लेने
का अधिकार उच्चतम न्यायालय को है।
राष्ट्रपति पर महाभियोग
अनुच्छेद 61 राष्ट्रपति के महाभियोग से
संबंधित है। भारतीय संविधान के अंतर्गत
मात्र राष्ट्रपति महाभियोजित होता है, अन्य
सभी पदाधिकारी पद से हटाये जाते है।
महाभियोजन एक विधायिका संबंधित
कार्यवाही है जबकि पद से हटाना एक
कार्यपालिका संबंधित कार्यवाही है।
महाभियोजन एक कडाई से पालित किया जाने
वाला औपचारिक कृत्य है जो संविधान
का उल्लघंन करने पर ही होता है। यह
उल्लघंन एक राजानैतिक कृत्य है
जिसका निर्धारण संसद करती है। वह
तभी पद से हटेगा जब उसे संसद मे प्रस्तुत
किसी ऐसे प्रस्ताव से हटाया जाये जिसे
प्रस्तुत करते समय सदन के १/४
सदस्यों का समर्थन मिले। प्रस्ताव पारित
करने से पूर्व उसको 14 दिन पहले नोटिस
दिया जायेगा। प्रस्ताव सदन की कुल
संख्या के 2/3 से अधिक बहुमत से पारित
होना चाहिये। फिर दूसरे सदन मे जाने पर
इस प्रस्ताव की जाँच एक समिति के
द्वारा होगी। इस समय
राष्ट्रपति अपना पक्ष स्वंय अथवा वकील
के माध्यम से रख सकता है। दूसरा सदन
भी उसे उसी 2/3 बहुमत से पारित करेगा।
दूसरे सदन द्वारा प्रस्ताव पारित करने के
दिन से राष्ट्रपति पद से हट जायेगा।
राष्ट्रपति की शक्तियाँ
न्यायिक शक्तियाँ
संविधान का 72वाँ अनुच्छेद
राष्ट्रपति को न्यायिक शक्तियाँ देता है
कि वह दंड का उन्मूलन, क्षमा, आहरण,
परिहरण, परिवर्तन कर सकता है।
क्षमादान –
किसी व्यक्ति को मिली संपूर्ण
सजा तथा दोष सिद्धि और उत्पन्न हुई
निर्योज्ञताओं को समाप्त कर देना तथा उसे
उस स्थिति मे रख देना मानो उसने कोई
अपराध किया ही नही था। यह लाभ
पूर्णतः अथवा अंशतः मिलता है तथा सजा देने
के बाद अथवा उससे पहले भी मिल सकती है।
लघुकरण – दंड की प्रकृति कठोर से
हटा कर नम्र कर देना उदाहरणार्थ सश्रम
कारावास को सामान्य कारावास में बदल
देना
परिहार – दंड की अवधि घटा देना परंतु
उस की प्रकृति नही बदली जायेगी
विराम – दंड मे कमी ला देना यह विशेष
आधार पर मिलती है जैसे
गर्भवती महिला की सजा मे कमी लाना
प्रविलंबन – दंड प्रदान करने मे विलम्ब
करना विशेषकर मृत्यु दंड के मामलॉ मे
राष्ट्रपति की क्षमाकारी शक्तियां पूर्णतः
उसकी इच्छा पर निर्भर करती हैं। उन्हें एक
अधिकार के रूप मे मांगा नही जा सकता है। ये
शक्तियां कार्यपालिका प्रकृति की है
तथा राष्ट्रपति इनका प्रयोग मंत्रिपरिषद
की सलाह पर करेगा। न्यायालय में
इनको चुनौती दी जा सकती है। इनका लक्ष्य
दंड देने मे हुई भूल का निराकरण करना है
जो न्यायपालिका ने कर दी हो।
शेरसिंह बनाम पंजाब राज्य 1983 मे
सुप्रीमकोर्ट ने निर्णय दिया की अनु 72,
अनु 161 के अंतर्गत दी गई
दया याचिका जितनी शीघ्रता से हो सके
उतनी जल्दी निपटा दी जाये।
राष्ट्रपति न्यायिक कार्यवाही तथा न्यायिक
निर्णय को नही बदलेगा वह केवल न्यायिक
निर्णय से राहत देगा याचिकाकर्ता को यह
भी अधिकार नही होगा कि वह सुनवाई के
लिये राष्ट्रपति के समक्ष उपस्थित हो
वीटो शक्तियाँ
विधायिका की किसी कार्यवाही को विधि
बनने से रोकने
की शक्ति वीटॉ शक्ति कहलाती है संविधान
राष्ट्रपति को तीन प्रकार के वीटो देता है।
(१) पूर्ण वीटो – निर्धारित प्रकिया से
पास बिल जब राष्ट्रपति के पास आये
(संविधान संशोधन बिल के अतिरिक्त)]
तो वह्
अपनी स्वीकृति या अस्वीकृति की घोषणा कर
सकता है किंतु यदि अनु 368 के अंतर्गत
कोई बिल आये तो वह
अपनी अस्वीकृति नही दे सकता है
यधपि भारत मे अब तक राष्ट्रपति ने इस
वीटो का प्रयोग बिना मंत्रिपरिषद की सलाह
के नही किया है माना जाता है कि वह
ऐसा कर भी नही सकता। (ब्रिटेन मे
यही पंरपंरा है जिसका अनुसरण भारत मे
किया गया है।)
(२) निलम्बनकारी वीटो – संविधान
संशोधन अथवा धन बिल के अतिरिक्त
राष्ट्रपति को भेजा गया कोई भी बिल वह
संसद को पुर्नविचार हेतु वापिस भेज
सकता है किंतु संसद यदि इस बिल
को वापिस पास कर के भेज दे तो उसके पास
सिवाय इसके कोई विकल्प नही है उस बिल
को स्वीकृति दे दे। इस वीटो को वह अपने
विवेकाधिकार से प्रयोग लेगा। इस
वीटो का प्रयोग अभी तक संसद सदस्यॉ के
वेतन बिल भत्ते तथा पेंशन नियम संशोधन
1991 मे किया गया था। यह एक वित्तीय
बिल था। राष्ट्रपति वेंकट रमण ने इस
वीटो का प्रयोग इस आधार पर
किया कि यह बिल लोकसभा मे
बिना उनकी अनुमति के लाया गया था।
(३) पाकेट वीटो – संविधान
राष्ट्रपति को स्वीकृति अस्वीकृति देने के
लिये कोई समय सीमा नही देता है
यदि राष्ट्रपति किसी बिल पे कोई निर्णय
ना दे [सामान्य न कि धन या संविधान
संशोधन ] तो माना जायेगा कि उस ने अपने
पाकेट वीटो का प्रयोग किया है यह
भी उसकी विवेकाधिकार शक्ति के अन्दर
आता है पेप्सू बिल 1956 तथा भारतीय डाक
बिल 1984 मे राष्ट्रपति ने इस
वीटो का प्रयोग किया था।
राष्ट्रपति की संसदीय शक्ति
राष्ट्रपति संसद का अंग है। कोई भी बिल
बिना उसकी स्वीकृति के पास
नही हो सकता अथवा सदन मे
ही नहीं लाया जा सकता है।
राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्तियाँ
1. अनु 74 के अनुसार
2. अनु 78 के अनुसार प्रधान
मंत्री राष्ट्रपति को समय समय पर मिल कर
राज्य के मामलॉ तथा भावी विधेयक़ो के बारे
मे सूचना देगा, इस तरह अनु 78 के अनुसार
राष्ट्रपति सूचना प्राप्ति का अधिकार
रखता है यह अनु प्रधान मंत्री पे एक
संवैधानिक उत्तरदायित्व रखता है यह
अधिकार राष्ट्रपति कभी भी प्रयोग
ला सकता है इसके माध्यम से वह
मंत्री परिषद को विधेयक़ो निर्णयॉ के
परिणामॉ की चेतावनी दे सकता है
3. जब कोई राजनैतिक दल लोकसभा मे
बहुमत नही पा सके तब वह अपने विवेकानुसार
प्रधानम्ंत्री की नियुक्ति करेगा
4. निलंबन वीटो/पाकेट
वीटो भी विवेकी शक्ति है
5. संसद के सदनो को बैठक हेतु बुलाना
6. अनु 75 (3) मंत्री परिषद के सम्मिलित
उत्तरदायित्व का प्रतिपादन करता है
राष्ट्रपति मंत्री परिषद को किसी निर्णय
पर जो कि एक मंत्री ने व्यक्तिगत रूप से
लिया था पर सम्मिलित रूप से विचार करने
को कह सकता है
7. लोकसभा का विघटन यदि मंत्रीपरिषद
को बहुमत प्राप्त नही है
तो लोकसभा का विघटन उसकी विवेक
शक्ति के दायरे मे आ जाता है
किसी कार्यवाह्क सरकार के पास
लोकसभा का बहुमत नही होता इस प्रकार
की सरकार मात्र सामन्य निर्णय ही ले
सकती है ना कि महत्वपूर्ण निर्णय यह
राष्ट्रपति निर्धारित करेगा कि निर्णय किस
प्रकृति का है
संविधान के अन्तर्गत राष्ट्रपति की स्थिति
रामजस कपूर वाद तथा शेर सिंह वाद मे
निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने
कहा कि संसदीय सरकार मे वास्तविक
कार्यपालिका शक्ति मंत्रिपरिषद मे है। 42,
44 वें संशोधन से पूर्व अनु 74 का पाठ
था कि एक मंत्रिपरिषद प्रधान
मंत्री की अध्यक्षता मे
होगी जो कि राष्ट्रपति को सलाह
सहायता देगी। इस अनुच्छेद मे यह
नही कहा गया था कि वह इस सलाह
को मानने हेतु बाध्य होगा या नही। केवल
अंग्रेजी पंरपरा के अनुसार
माना जाता था कि वह बाध्य है। 42 वे
संशोधन द्वारा अनु 74 का पाठ बदल
दिया गया राष्ट्रपति सलाह के अनुरूप काम
करने को बाध्य माना गया। 44वें संशोधन
द्वारा अनु 74 मे फिर बद्लाव किया गया।
अब राष्ट्रपति दी गयी सलाह को पुर्नविचार
हेतु लौटा सकता है किंतु उसे उस सलाह के
अनुरूप काम करना होगा जो उसे दूसरी बार
मिली हो।