Wednesday, 3 December 2014

History of indo-china war

भारत-चीन युद्ध
भारत - चीन युद्ध
शीत युद्ध का भाग
भारत - चीन के बीच हुआ युद्ध
तिथि 20 अक्टूबर r [1] – 21 नवम्
1962
स्था
न
दक्षिणी क्सिंजिंग (अक्साई ची
and अरुणाचल प्रदेश (दक्षि
तिब्बत, उत्तर पूर्व फ्रंटिय
एजेंसी )
परिण
ाम
चीनी सेना की जीत
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन
की छवि धूमिल
क्षेत्
रीय
बदल
ाव
अक्साई चिन चीन के नियंत्रण
आया
योद्धा
भारत चीन
सेनानायक
बृज मोहन
कौल
जवाहरलाल नेहरु
वी. के. कृष्ण
मेनन
प्राण नाथ थापर
जहाँग गुओ
माओ ज़ेडों
लिऊ बोचें
लिन बिओं
ज्होउ एन
शक्ति/क्षमता
10,000–12,000 80,000 [2][3]
मृत्यु एवं हानि
1,383 मृत्यु [4]
1,047 घायल [4]
1,696 लापता [4]
3,968 बंदी [4]
722 मृत्यु. [4
1,697 घायल [4]
भारत-चीन युद्ध जो भारत चीन
सीमा विवाद के रूप में भी जाना जाता है,
चीन और भारत के बीच 1962 में हुआ एक
युद्ध था। विवादित हिमालय सीमा युद्ध के
लिए एक मुख्य बहाना था, लेकिन अन्य
मुद्दों ने भी भूमिका निभाई। चीन में
1959 के तिब्बती विद्रोह के बाद जब
भारत ने दलाई लामा को शरण दी तो भारत
चीन सीमा पर हिंसक घटनाओं की एक
श्रृंखला शुरू हो गयी। भारत ने फॉरवर्ड
नीति के तहत मैकमोहन रेखा से
लगी सीमा पर अपनी सैनिक
चौकियाँ रखी जो 1959 में चीनी प्रीमियर
झोउ एनलाई के द्वारा घोषित वास्तविक
नियंत्रण रेखा के पूर्वी भाग के उत्तर में
थी।
चीनी सेना ने 20 अक्टूबर 1962 को
लद्दाख में और मैकमोहन रेखा के पार एक
साथ हमले शुरू किये।
चीनी सेना दोनों मोर्चे में भारतीय
बलों पर उन्नत साबित हुई और
पश्चिमी क्षेत्र में चुशूल में रेजांग-ला एवं
पूर्व में तवांग पर कब्ज़ा कर लिया। जब
चीन ने 20 नवम्बर 1962 को युद्ध
विराम और साथ ही विवादित क्षेत्र से
अपनी वापसी की घोषणा की तब युद्ध खत्म
हो गया।
भारत चीन युद्ध कठोर परिस्थितियों में
हुई लड़ाई के लिए उल्लेखनीय है। इस युद्ध
में ज्यादातर लड़ाई 4250 मीटर (14,000
फीट) से अधिक ऊंचाई पर लड़ी गयी। इस
प्रकार की परिस्थिति ने दोनों पक्षों के
लिए रसद और अन्य लोजिस्टिक समस्याएँ
प्रस्तुत की। भारत चीन युद्ध चीनी और
भारतीय दोनों पक्ष
द्वारा नौसेना या वायु सेना का उपयोग
नहीं करने के लिए भी विख्यात है।
स्थान
चीन और भारत के बीच एक लंबी सीमा है
जो नेपाल और भूटान के द्वारा तीन
अनुभागो में फैला हुआ है। यह
सीमा हिमालय पर्वतों से लगी हुई है
जो बर्मा एवं तत्कालीन
पश्चिमी पाकिस्तान (आधुनिक पाकिस्तान)
तक फैली है। इस सीमा पर कई विवादित
क्षेत्र अवस्थित हैं। पश्चिमी छोर में
अक्साई चिन क्षेत्र है जो स्विट्जरलैंड के
आकार का है। यह क्षेत्र चीनी स्वायत्त
क्षेत्र झिंजियांग और तिब्बत (जिसे चीन ने
1965 में एक स्वायत्त क्षेत्र घोषित
किया) के बीच स्थित है। पूर्वी सीमा पर
बर्मा और भूटान के बीच वर्तमान भारतीय
राज्य अरुणाचल प्रदेश (पुराना नाम- नॉर्थ
ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) स्थित है। 1962 के
संघर्ष में इन दोनों क्षेत्रों में चीनी सैनिक
आ गए थे।
ज्यादातर लड़ाई ऊंचाई वाली जगह पर हुई
थी। अक्साई चिन क्षेत्र समुद्र तल से
लगभग 5,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित
साल्ट फ्लैट का एक विशाल रेगिस्तान है और
अरुणाचल प्रदेश एक पहाड़ी क्षेत्र है
जिसकी कई चोटियाँ 7000 मीटर से अधिक
ऊँची है। सैन्य सिद्धांत के मुताबिक आम
तौर पर एक हमलावर को सफल होने के
लिए पैदल सैनिकों के 3:1 के अनुपात
की संख्यात्मक
श्रेष्ठता की आवश्यकता होती है।
पहाड़ी युद्ध में यह अनुपात
काफी ज्यादा होना चाहिए क्योंकि इलाके
की भौगोलिक रचना दुसरे पक्ष को बचाव
में मदद करती है। चीन इलाके का लाभ
उठाने में सक्षम था और
चीनी सेना का उच्चतम चोटी क्षेत्रों पर
कब्जा था। दोनों पक्षों को ऊंचाई और
ठंड की स्थिति से सैन्य और अन्य
लोजिस्टिक कार्यों में
कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और
दोनों के कई सैनिक जमा देने वाली ठण्ड से
मर गए।
परिणाम
चीन द्वारा अधिकृत भारतीय भूमि
चीन
चीन के सरकारी सैन्य इतिहास के अनुसार,
इस युद्ध से चीन ने अपने पश्चिमी सेक्टर
की सीमा की रक्षा की नीति के
लक्ष्यों को हासिल किया, क्योंकि चीन ने
अक्साई चिन का वास्तविक नियंत्रण बनाए
रखा। युद्ध के बाद भारत ने फॉरवर्ड
नीति को त्याग दिया और वास्तविक
नियंत्रण रेखा वास्तविक सीमाओं में
परिवर्तित हो गयी।
जेम्स केल्विन के अनुसार, भले ही चीन ने एक
सैन्य विजय पा ली परन्तु उसने
अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि के मामले में
खो दी। पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका,
को पहले से ही चीनी नजरिए, इरादों और
कार्यों पर शक था। इन देशों ने चीन के
लक्ष्यों को विश्व विजय के रूप में
देखा और स्पष्ट रूप से यह
माना की सीमा युद्ध में चीन हमलावर के रूप
में था। चीन की अक्टूबर 1964 में प्रथम
परमाणु हथियार परीक्षण करने और 1965
के भारत पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान
को समर्थन करने से कम्युनिस्टों के लक्ष्य
तथा उद्देश्यों एवं पूरे पाकिस्तान में
चीनी प्रभाव के अमेरिकी राय
की पुष्टि हो जाती है।
भारत
युद्ध के बाद भारतीय सेना में व्यापक
बदलाव आये और भविष्य में इसी तरह के
संघर्ष के लिए तैयार रहने की जरुरत महसूस
की गई। युद्ध से भारतीय
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर दबाव
आया जिन्हें भारत पर चीनी हमले
की आशंका में असफल रहने के लिए जिम्मेदार
के रूप में देखा गया। भारतीयों में
देशभक्ति की भारी लहर उठनी शुरू
हो गयी और युद्ध में शहीद हुए भारतीय
सैनिकों के लिए कई स्मारक बनाये गए।
यकीनन, मुख्य सबक जो भारत ने युद्ध से
सीखा है वह है अपने ही देश को मजबूत
बनाने की जरूरत और चीन के साथ नेहरू
की "भाईचारे" वाली विदेश नीति से एक
बदलाव की। भारत पर चीनी आक्रमण
की आशंका को भाँपने की अक्षमता के कारण,
प्रधानमंत्री नेहरू को चीन के साथ
शांतिवादी संबंधों को बढ़ावा के लिए
सरकारी अधिकारियों से कठोर
आलोचना का सामना करना पड़ा। भारतीय
राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने कहा कि नेहरू
की सरकार अपरिष्कृत और तैयारी के बारे में
लापरवाह थी। नेहरू ने स्वीकार
किया कि भारतीय अपनी समझ की दुनिया में
रह रहे थे। भारतीय नेताओं ने
आक्रमणकारियों को वापस खदेड़ने पर
पूरा ध्यान केंद्रित करने की बजाय
रक्षा मंत्रालय से कृष्ण मेनन को हटाने पर
काफी प्रयास बिताया। भारतीय सेना कृष्ण
मेनन के "कृपापात्र को अच्छी नियुक्ति"
की नीतियों की वजह से विभाजित
हो गयी थी और कुल मिलाकर 1962
का युद्ध भारतीयों द्वारा एक सैन्य पराजय
और एक राजनीतिक आपदा के संयोजन के रूप
में देखा गया। उपलब्ध विकल्पों पर गौर
न करके बल्कि अमेरिकी सलाह के तहत भारत
ने वायु सेना का उपयोग
चीनी सैनिको को वापस खदेड़ने में
नहीं किया। सीआईए (अमेरिकी गुप्तचर
संस्था) ने बाद में कहा कि उस समय तिब्बत
में न तो चीनी सैनिको के पास में पर्याप्त
मात्रा में ईंधन थे और न
ही काफी लम्बा रनवे था जिससे वे वायु
सेना प्रभावी रूप से उपयोग करने में
असमर्थ थे। अधिकाँश भारतीय चीन और
उसके सैनिको को संदेह की दृष्टि से देखने
लगे। कई भारतीय युद्ध को चीन के साथ
एक लंबे समय से शांति स्थापित करने में
भारत के प्रयास में एक विश्वासघात के रूप
में देखने लगे। नेहरू द्वारा "हिन्दी-
चीनी भाई, भाई" (जिसका अर्थ है "भारतीय
और चीनी भाई हैं") शब्द के उपयोग पर
भी सवाल शुरू हो गए। इस युद्ध ने नेहरू
की इन आशाओं को खत्म कर दिया कि भारत
और चीन एक मजबूत एशियाई ध्रुव
बना सकते हैं जो शीत युद्ध गुट
की महाशक्तियों के बढ़ते प्रभाव
की प्रतिक्रिया होगी।
सेना के पूर्ण रूप से तैयार नहीं होने
का सारा दोष रक्षा मंत्री मेनन पर आ गया,
जिन्होंने अपने सरकारी पद से इस्तीफा दे
दिया ताकि नए मंत्री भारत के सैन्य
आधुनिकीकरण को बढ़ावा दे सके।
स्वदेशी स्रोतों और आत्मनिर्भरता के
माध्यम से हथियारों की आपूर्ति की भारत
की नीति को इस युद्ध ने पुख्ता किया।
भारतीय सैन्य कमजोरी को महसूस करके
पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर में घुसपैठ
शुरू कर दी जिसकी परिणिति अंततः 1965
में भारत के साथ दूसरा युद्ध से हुआ।
हालांकि, भारत ने युद्ध में भारत की अपूर्ण
तैयारी के कारणों के लिए हेंडरसन-ब्रूक्स-
भगत रिपोर्ट का गठन किया था। परिणाम
अनिर्णायक था, क्योंकि जीत के फैसले पर
विभिन्न स्रोत विभाजित थे। कुछ
सूत्रों का तर्क है कि चूंकि भारत ने
पाकिस्तान से अधिक क्षेत्र पर कब्जा कर
लिया था, भारत स्पष्ट रूप से जीता था।
लेकिन, दूसरों का तर्क था कि भारत
को महत्वपूर्ण नुकसान उठाना पड़ा था और
इसलिए, युद्ध का परिणाम अनिर्णायक था।
दो साल बाद, 1967 में, चोल घटना के
रूप में चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच एक
छोटी सीमा झड़प हुई। इस घटना में आठ
चीनी सैनिकों और 4 भारतीय
सैनिकों की जान गयी।
हेंडरसन-ब्रूक्स-भगत रिपोर्ट
हार के कारणों को जानने के लिए भारत
सरकार ने युद्ध के तत्काल बाद ले. जनरल
हेंडरसन ब्रुक्स और इंडियन
मिलिट्री एकेडमी के तत्कालीन कमानडेंट
ब्रिगेडियर पी एस भगत के नेतृत्व में एक
समिति बनाई थी। दोनों सैन्य
अधिकारियो द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट
को भारत सरकार अभी भी इसे गुप्त
रिपोर्ट मानती है। दोनों अधिकारियों ने
अपनी रिपोर्ट में हार के लिए
प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू
को जिम्मेदार ठहराया था।

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